जब कोई इंसान हमारी ज़िंदगी में होता है,
तब हम उसके लिए सबसे कम वक्त निकालते हैं।
हम कहते हैं— “अभी बिज़ी हूँ”, “बाद में बात करेंगे”,
और मन ही मन मान लेते हैं कि वो हमेशा रहेगा।
उसकी मौजूदगी हमें इतनी आदत सी लग जाती है
कि हम उसे हल्के में लेने लगते हैं।
हमें लगता है— कल भी मिलेगा, परसों भी मिलेगा,
ज़िंदगी लंबी है, वक्त बहुत है।
लेकिन जिस दिन वो इंसान चला जाता है,
उसी दिन वक्त का मतलब बदल जाता है।
अब हमारे पास वक्त ही वक्त होता है—
पर बात करने के लिए कोई नहीं होता।
हर जगह वही, पर कहीं नहीं
वो इंसान अब सामने नहीं होता,
लेकिन उसकी मौजूदगी हर जगह महसूस होती है।
दिल में—
जहाँ हर धड़कन उसके नाम से जुड़ी लगती है।
दिमाग़ में—
जहाँ हर ख़ामोशी सवाल बन जाती है।
किताबों में—
जहाँ हर पंक्ति अधूरी सी लगती है।
गीतों में—
जहाँ हर शब्द उसी की याद दिला देता है।
हम लिखते भी उसी को हैं
और ढूंढते भी उसी को—
हर चेहरे में, हर आवाज़ में, हर एहसास में।
आगे बढ़ जाना सबके बस की बात नहीं
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।
शायद वो ज़्यादा मज़बूत होते हैं,
या शायद उनकी किस्मत उन्हें सहारा दे देती है।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो न भूल पाते हैं,
न आगे बढ़ पाते हैं।
वो वहीं अटक जाते हैं—
उस आख़िरी बातचीत में,
उस आख़िरी मुलाक़ात में,
और उस आख़िरी वाक्य में—
“ख़याल रखना।”
उनके लिए ज़िंदगी आगे नहीं बढ़ती,
बस चलती रहती है।
किसी के जाने के बाद जीना
किसी अपने के चले जाने के बाद
जीना आसान नहीं होता।
दर्द सिर्फ़ यादों में नहीं रहता,
वो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतर आता है—
मुस्कुराते चेहरे के पीछे,
भीड़ में खड़े इंसान के अंदर,
और रात की ख़ामोशी में।
हम बाहर से सामान्य दिखते हैं,
लेकिन अंदर कुछ हमेशा के लिए टूट चुका होता है।
कदर और पछतावे के बीच
शायद यही ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है—
कदर हमेशा देर से होती है
और पछतावा हमेशा सच्चा।
अगर कोई आज आपके साथ है,
तो उसके लिए वक्त निकालिए।
क्योंकि जब वो चला जाता है,
तो वक्त तो बहुत होता है…
पर वो इंसान नहीं होता।
Incomplete Without You
(Unfulfilled Wishes and Emptiness)
I am learning to live without you,
but not a single day passes without realizing this—
life didn’t break when you left,
it just stopped feeling complet
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