🌿 खुद को जानना – सबसे कठिन लेकिन सबसे सुंदर यात्रा
लेखक: देवेंद्र मिश्रा
“खुद को जानना बेहद मुश्किल काम है,
क्योंकि दुनिया को तो हम गूगल पर खोज लेते हैं,
पर खुद को… कभी खोजा है?”
हम दूसरों को पहचानने में माहिर हैं।
कौन कैसा है, क्या सोचता है, क्या करता है – हम तुरंत एक राय बना लेते हैं।
लेकिन जब बात खुद की आती है,
तो हम उलझ जाते हैं।
कभी कोई हमें कह देता है – “Notorious”
कोई हमें बुलाता है – “Whimsical”
और ऐसे शब्द हमारे भीतर चुभ जाते हैं,
क्योंकि हम सोचने लगते हैं –
“कहीं ये सच तो नहीं?”
हम खुद को संदेह से भर लेते हैं।
अपने ही अस्तित्व पर सवाल उठाने लगते हैं।
🌸 खुद को जानना, खुद से प्रेम करना
खुद से प्रेम करना, खुद को स्वीकारना और पहचानना –
शायद आज की सबसे बड़ी चुनौती है।
क्योंकि हम हर किसी की किताब में एक अलग किरदार हैं –
कभी अच्छे, कभी बुरे।
पर हकीकत यह है कि सही या गलत जैसी कोई स्थायी परिभाषा नहीं होती,
ये तो हमारी धारणाएं और दृष्टिकोण हैं।
ओशो कहते हैं –
“दूसरों की नजरों में खुद को देखना बंद करो,
क्योंकि वो केवल तुम्हारा प्रतिबिंब दिखाते हैं – असली ‘तुम’ नहीं।”
🌿 एक आईना, एक सवाल
एक बार एक साधु ने एक लड़के को आईना थमाया और पूछा –
“इसमें क्या दिखता है?”
लड़का बोला – “मैं”
साधु मुस्कराए और बोले –
“ये तुम नहीं हो, ये तो केवल एक प्रतिबिंब है।
जैसे दुनिया तुम्हें देखती है, वैसे ही वो अपना एक आईना बनाती है –
पर उसमें दिखने वाला चेहरा, तुम्हारी आत्मा नहीं है।”
यही बात आज हर उस इंसान के लिए ज़रूरी है
जो बार-बार खुद को दूसरों के शब्दों, उनके व्यवहार और राय में मापता है।
🌼 गलतियाँ होंगी – और वो ज़रूरी हैं
आपने भी कहा –
“कई बार गलतियाँ होंगी, और वो होना लाज़मी है…
पर उन्हें लेकर खुद को आहत मत करो।”
क्योंकि जीवन में गिरना, टूटना, सीखना ही तो असली विकास है।
खुद से सवाल करना, फिर खुद को सच्चाई से अपनाना –
यही आत्म-प्रेम है।
✨ निष्कर्ष: अपने भीतर झाँकने की कला
ओशो के शब्दों में कहें तो:
“भीतर जाओ।
वहां न कोई नाम है, न कोई चेहरा –
बस तुम हो, अपने पूरे सत्य के साथ।”
तो अगली बार जब कोई आपको कुछ कहे –
कोई नाम दे, कोई टैग लगाए –
तो रुकिए।
सोचिए –
“क्या ये मैं हूँ? या बस एक प्रतिबिंब?”
और फिर,
धीरे-धीरे,
खुद से प्रेम करना सीखिए।
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