किताबों की सबसे ख़ास बात यह है कि आज भी पूरी दुनिया में किताब ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो सबसे गहरा असर छोड़ता है। इसका कारण बहुत साधारण है—जब आप कोई किताब पढ़ते हैं, तो लेखक के शब्द ठीक उसी रूप में आपके सामने खुलते हैं, जैसा उसने उन्हें लिखा था। वहाँ कोई तीसरा व्यक्ति नहीं होता, जो उन शब्दों की व्याख्या बदल दे।
अगर हम इसकी तुलना फिल्मों से करें, तो फर्क साफ़ नज़र आता है। जब कोई फिल्म बनती है, तो लेखक की कल्पना में निर्देशक, अभिनेता, संगीतकार, सेट डिज़ाइनर, और तकनीकी टीम जुड़ जाती है। कल्पना कई स्तरों पर बंट जाती है। जबकि किताब में लेखक की सोच पाठक तक सीधे पहुँचती है—बिना किसी रुकावट के।
उदाहरण के लिए “The Godfather” को लें। इस पर बनी फिल्म को करोड़ों लोगों ने देखा, लेकिन Mario Puzo की लिखी मूल किताब को केवल लाखों ने पढ़ा। और जब फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो रही थी, तब शायद 500 लोगों ने भी उसे नहीं पढ़ा होगा—क्योंकि वह स्क्रिप्ट केवल निर्माण के निर्देश बनकर रह गई थी।
मैं यह नहीं कहता कि कोई माध्यम छोटा या बड़ा होता है, लेकिन एक लेखक के रूप में मैंने यह महसूस किया है कि जब आप लिखते हैं, तो उस लेख में आपकी पूरी दुनिया बसती है—उसका हर किरदार, हर भाव, हर रंग आपके भीतर से आता है। पर जब आप ऑडियो या फिल्म के लिए लिखते हैं, तो आपकी सोच को किसी और की आवाज़, संगीत, या दृश्य प्रभावों की ज़रूरत पड़ती है। वह एक स्तर की “प्रोसेसिंग” मांगता है।
किताब की सबसे बड़ी शक्ति यही है—इसे इंसान अकेले पढ़ता है, और अकेला इंसान बदला जा सकता है।
भीड़ को नहीं बदला जा सकता, लेकिन एक पाठक का अंतर्मन जरूर बदला जा सकता है।
इसलिए किताबें पढ़िए,
क्योंकि किताबें सिर्फ ज्ञान नहीं देतीं,
वे इंसान को भीतर से मजबूत बनाती हैं।
वो आवाज़ देती हैं, जो भीड़ में सुनाई नहीं देती।
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