हाल के दिनों में मैंने अपने भीतर कुछ बदलते हुए महसूस किया है।
मैं पहले ऐसा इंसान था, जिसके पास हर सवाल का जवाब होता था — हर बात पर एक राय, हर स्थिति में कुछ कहने की जल्दी।
मैं इतना बोलता था कि दूसरों को बोलने की जगह ही नहीं मिलती थी।
लेकिन अब… मौन मुझे शब्दों से अधिक सुकून देने लगा है।
अब मुझे हर बात पर राय बनानी नहीं आती। अब मैं बस सुनना चाहता हूँ — लोगों की आवाज़ नहीं, उनके मौन को; उनके शब्दों के पीछे छिपे एहसासों को।
अब मुझे जवाब देने की उतनी ज़रूरत नहीं लगती — शायद इसलिए क्योंकि मैंने महसूस करना सीख लिया है।
अब मैं सवाल नहीं ढूंढता, मैं सिर्फ लोगों को समझना चाहता हूँ।
और शायद… यही समझ, यही मौन — असल में सबसे गहरी ताक़त है।”**
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