25 दिसंबर 2024, रात 1 बजे
कुछ सवाल ऐसे हैं जो मन को अंदर तक बेचैन कर गए हैं। आँखें बंद कीं तो अचानक एक सवाल आया—“प्रेम क्या है?”
पिछले कुछ दिनों में, कुछ गलत धारणाओं ने मन को झकझोर दिया है। फिर बचपन की कुछ बातें याद करने लगा—जब हम 11वीं या 12वीं में होते हैं, तो कोई वरमा अंकल या गुप्ता अंकल जैसे लोग एक ‘प्रेत’ की तरह आकर सवाल करते हैं—”बेटा, आगे क्या करोगे?”
पर हम नहीं बता पाते कि हम तो ‘फ्रेंड ज़ोन’ में फँस चुके हैं, और आप मुझसे मेरे CGPA, गणित के किस विषय की तैयारी कर रहा हूँ, जैसे नीरस और शुष्क विषयों पर बात करना चाहते हैं। और ये ‘प्रेत’ हमेशा हमारे माता-पिता के सामने ही आता है।
कई बार जब हम अकेले शीशे में खुद को देखते हैं या अपने आस-पास के लोगों को देखते हैं, तो हमारे अरमान उस सुनहरी दुनिया के काल्पनिक कालीन पर सवार होकर यहाँ-वहाँ भटकने लगते हैं। किसी का परफ्यूम अच्छा लगता है, किसी की गाड़ी शानदार, तो किसी की ड्रेस। उस वक्त ऐसा लगता है कि, “ये अच्छा तो है, पर क्या मैं खुद इसे कर पाऊँगा?”
हमने जीवन में अब तक क्या हासिल किया है, ये सोचकर संशय घेर लेता है—”क्या मैं कुछ कर पाऊँगा? कुछ बन पाऊँगा? या फिर पापा का प्यारा बेटा या बेटी बनकर ही रह जाऊँगा?”
ये संशय बहुत ज़रूरी है। ये संशय अर्जुन (पार्थ) को भी हुआ था, और तब उन्हें कृष्ण मिले। कृष्ण सिर्फ इसलिए नहीं मिले कि उन्हें संशय था, बल्कि इसलिए भी मिले कि उनके भीतर किसी गुरु, किसी बड़े, किसी ज्ञानी व्यक्ति को सुनने का धैर्य और समझने का संकल्प था।
हमारे यहाँ उपनिषदों की परंपरा है—“Ask and listen.”
वैसे, मैं खुद बहुत अच्छा श्रोता नहीं हूँ, क्योंकि बातूनी काफी हूँ। लेकिन ये 16-17 साल की उम्र में कहाँ समझ आती है! बातों से ज़्यादा शाम के चौमिन, मंचूरियन में सुख मिलता है। पढ़ाई एक ज़रूरी काम है, पर उससे भी ज़रूरी कुछ और काम है, और वो है—प्रेम।
प्रेम, ये इतना कमाल का शब्द है कि अलग-अलग भाषाओं में इसे सुनने से भी किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। अगर वो पीछे की बेंच पर बैठा हो, तो ये मुस्कान बन जाती है, और अगर सामने की बेंच पर हो, तो वो कहता है, “कैसी बातें कर रहे हो, भाई साहब।”
अगर हवा का रंग बदल रहा है, तो आप प्रेम में हैं।
अगर आपका गुरु या कोई बड़ा व्यक्ति आपको कुछ नया सिखाता है और आप उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं, तो आप प्रेम में हैं।अगर आपको पढ़ने में मज़ा आता है – चाहे वह कुछ भी हो, चाहे कैनन डोली का हाथ पकड़कर साउथ अमेरिका के साहित्य में दाखिल हो जाएं या जे.के. रोलिंग को पढ़कर किसी यूनिवर्सिटी के छात्र बन जाएं। तीसरे दिन स्वप्नवास दासा को पढ़कर हम सीखते हैं कि 2600 साल पहले हमारे संस्कृत में महापुरुष कैसे नाटक रच रहे थे। चौथे दिन सुबह आपकी मुलाकात अज्ञेय के “नदी के द्वीप” से होती है और आप चकित होते हैं कि कैसे नदी के दो किनारे साथ तो हैं, पर मिल नहीं सकते।
जिंदगी बेहद खूबसूरत है। कभी खुशबू के शक्ल में, कभी किसी ताज़े हुए शब्दों में, कभी सीख में, कभी स्पर्श में। तो समझ लीजिए आप प्रेम में हैं। और मुबारक हो, आप जीवित हैं। मुबारक हो, आप बीते नहीं, बढ़ रहे हैं।
जिंदगी बेहद खूबसूरत है—कभी खुशबू की शक्ल में, कभी किसी तपे हुए शब्दों में, कभी सीख में, कभी स्पर्श में।
तो समझ लीजिए, आप प्रेम में हैं।
और मुबारक हो, आप जीवित हैं।
मुबारक हो, आप बीत नहीं रहे, बढ़ रहे हैं।
“प्रेम क्या है?—’प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय।’”
इस प्रेम में बड़ी महारत हासिल करनी पड़ती है, और मैं चाहता हूँ कि इसे स्कूलों और सिलेबस में पढ़ाया जाए। क्योंकि जीवन तो इसे पढ़ाता ही है।
इसके लिए सबसे ज़रूरी है—अहंकार से मुक्त होना, ‘मैं’ का विसर्जन करना।
अगर आप क्लास के वो छात्र हैं, जो अपने टीचर से सवाल इसलिए पूछते हैं कि वो जवाब न दे पाएँ और उनकी हँसी उड़ाई जा सके, तो आप मोहब्बत में नहीं, मूर्खता की गिरफ्त में हैं।
अगर आप किसी से सवाल इसलिए पूछते हैं कि अपनी बात मनवा सकें, तो यह प्रेम नहीं है।
प्रेम ज्ञान के प्रति होना चाहिए—वो ज्ञान, जो कौतुहल से पैदा होता है।
माँ से मैंने बचपन में पूछा था, “माँ, तुम तो कह रही थीं कि लालटेन आखिरी पहर में धीमी पड़ जाती है, पर ये वाली लालटेन धीमी क्यों नहीं हो रही?” माँ ने कहा, “इसमें ईश्वर इंधन दे रहा है और इसे हम चाँद कहते हैं।”
यही कौतुहल है।
माँ हमारी पहली प्रेम है।
वो जब हमें दूध पिलाती है, तो हमें पोषण का प्रेम समझ आता है।यह कौतुक है। उसने कहानियाँ सुनाई, दृश्य दिखाए। माँ, जो हमारा पहला प्रेम है, दुनिया को हमें दिखाने के लिए कितने बीज-मंत्र देती है। वह जब हमें दूध पिलाती है, तो हमें पोषण का प्रेम समझ आता है। और कई सालों बाद, जब तुम किसी ऐसे इलाके में घूम रहे हो जो राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार कुपोषण का शिकार है, तब तुम्हें अपना बचपन याद आएगा। माँ ने जब तुम्हें पोषण दिया, तब ही तुमने देखा कि उसने अपने पोषण का ख्याल सबसे आख़िरी में किया।वह जब तुम्हारे कानों में स्वर गूंथती है, तुम्हें अपने आलाप समझ में आते हैं। तुम पलटकर देखते हो तो लगता है कि मैं तो ‘आ’, ‘का’, ‘ला’, और ‘गा’ बड़े अटपटे से बोलता था। पर माँ कैसे समझ जाती थी कि मुझे दर्द हो रहा है, नींद आने वाली है, या मुझे दूध चाहिए? क्योंकि माँ ने तुम्हारी लिपि गढ़ी थी और तुम्हारी ध्वनि को ज्यादा प्रेम दिया था।
कल तुम दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में जाओगे, तो तुम्हें ध्यान देना होगा कि जब तुम जिससे बात कर रहे हो, तब तुम्हें उसकी भाषा में बात करनी होगी। जब किसी वैज्ञानिक से बात करते हो तो अलग, और जब किसी किशोरवय लड़की से बात करते हो तो अलग। जो तुम्हारी सेवा कर रहे हैं और तुम्हारी ज़िंदगी को आसान बना रहे हैं, उनके साथ तुम्हारा बर्ताव उतना ही विनम्रता से भरा होना चाहिए।
You are full of gratitude when someone opens the door for you. You are full of gratitude when someone comes and asks – Sir, kya lenge aap.
याद रखना, जो तुमसे सवाल पूछता है, दरवाजा खोलता है, या तुम्हारी जिंदगी को आसान बनाता है, उनके प्रति विनम्रता और कृतज्ञता का भाव रखना।
“The great power comes with great responsibility.”
यह प्रेम याद रखना, क्योंकि यही तुम्हें विनम्र, भावुक और सीखने के लिए प्रेरित करता है।
तुम्हें बीतना नहीं, बढ़ना है।
और बढ़ने के लिए अहंकार से मुक्त होना है।
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